पाठ्यचर्या का विकास

 पाठ्यचर्या का विकास


जैसा कि हम जानते हैं कि पाठ्यचर्या संपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया का केन्द्र होता है।  यह एक धुरी है जिस पर संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था घुमती है। जॉन डी० वी० ने भी शिक्षा को त्रिमुखी प्रक्रिया इसलिए कहा है क्योंकि शिक्षक एवं शिक्षार्थी पाठ्यचर्या के अभाव में शिक्षा प्रक्रिया को पूर्ण नहीं बना सकते । पाठ्यचर्या शैक्षिक प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करती है, परंतु समय-समय के साथ-साथ उसमें कुछ दोष भी आ जाते हैं तथा उन


दोषों को दूर करने एवं पाठ्यचर्चा में नवीनता लाने हेतु पाठ्यचर्या विकास सहयोग लिया जाता है। परंतु पाठ्यचर्या विकास एक जटिल कार्य है जो शिक्षा के लक्ष्यों को पूर्ण करने एवं बालक के सर्वागीण विकास हेतु किया जाता है। यह एक सुनियोजित प्रक्रिया है तथा इसमें विभिन्न तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक हो जाता है। आधुनिक पाठ्यचर्चा न केवल विद्यालय अपितु विद्यालय से बाहर के अनुभव भी शामिल होते हैं। ये अनुभव बालक के संपूर्ण विकास में सहायक होते है। मुदालियर आयोग ने भी इसी बात पर बल देते हुए कहा है- "विद्यालय का संपूर्ण जीवन पाठ्यचर्या बन जाता है जो छात्रों के जीवन के सभी पहलुओं से सम्बन्ध रख सकता है और संतुलित विकास व्यक्तित्व के विकास में सहायता दे सकता है।


इस प्रकार पाठ्यचर्या का बालक के जीवन में अत्यधिक महत्व है इसलिए पाठ्यचर्या का निर्माण एवं विकास करते समय निम्नलिखित सिद्धान्त को ध्यान में रखा जाना अत्यंत आवश्यक है -


व्यापकता का सिद्धान्त 
बाल केन्द्रिता का सिद्धांत 
उपयोगिता का सिद्धान्त
 दुरदर्शिता का सिद्धान्त
लचीलेपन का सिद्धान्त 
 विविधता का सिद्धान्त
लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास का सिद्धान्त
निरन्तरता का सिद्धान्त 
मानवीय मूल्यों के विकास का सिद्धान्त
श्रम के प्रति आदर का सिद्धांत
खाली समय के सदुपयोग का सिद्धान्त
पाठ्यचर्या के तत्कालीन घटनाओं से सम्बन्धित होने का सिद्धांत 
शैक्षिक उद्देश्यों से अनुरूपता का सिद्धान्त
 जीवन से सम्बन्धित होने का सिद्धान्त
उत्तम आचरण के आदर्शों की प्राप्ति का सिद्धान्त
 सह-सम्बन्ध का सिद्धांत
अनुभवों पर आधारित सिद्धान्त
वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त

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